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Tuesday, November 2, 2021

 जय परशुरामजी: 

धनतेरस के दिन आज शुभ कार्य से मिलेगा तीगुणा फल, जानिए धनतेरस का शुभ मुहूर्त 

'हमसफर मित्र न्यूज' 


आज 2 नवंबर2021 मंगलवार को धनतेरस पर त्रिपुष्कर योग-धनतेरस पर त्रिपुष्कर योग बन रहा है। इस योग में किए गए कार्य का फल तिगुना मिलता है। इस दौरान किसी भी बुरे काम को करने से बचना चाहिए। इस दिन शुभ कार्य करने पर उसका तीन गुना फल प्राप्त होने की मान्यता है। इसलिए इस दिन निवेश करना शुभ माना जाता है। सोने और चांदी की चीजें खरीदना भी उत्तम रहेगा।

धनतेरस पर ग्रहों की युति-

धनतेरस पर तीन ग्रह मिलकर शुभ संयोग बना रहे हैं। सूर्य, मंगल और बुध धनतेरस के दिन तुला राशि में विराजमान रहेंगे। बुध और मंगल मिलकर धन योग का निर्माण करते हैं। जबकि बुध और सूर्य की युति से बुधादित्य योग का निर्माण होगा। इस योग को रायोग की श्रेणी में रखा जाता है। इसके अलावा मंगल और बुध की युति को व्यापार के लिए अति लाभकारी माना जाता है। 

धनतेरस पर बुध का राशि परिवर्तन-

धनतेरस के दिन बुध संक्रांति का शुभ योग बन रहा है। इस दिन बुध ग्रह तुला राशि में गोचर करेंगे। बुध 2 नवंबर से 22 नवंबर तक इसी राशि में रहेंगे। बुध को व्यापार और वाणी का कारक माना जाता है। इसलिए धनतेरस के दिन व्यापारियों को लाभ होने की संभावना है।

 धनतेरस शुभ मुहूर्त

धनतेरस पर पूजा का मुहूर्त सुबह 06 बजकर 18 मिनट और रात 10 से 08 बजकर 11 मिनट और 20 सेकेंड तक रहेगा. इस समय अवधि में धन्वंतरि देव की पूजा की जाएगी. प्रदोष काल 5 बजकर 35 मिनट और 38 सेकेंड से 08 बजकर 11 मिनट और 20 सेकेंड तक रहेगा.

खरीदारी करने का शुभ मुहूर्त

धनतेरस पर सोना-चांदी के आभूषण खरीदने के लिए शुभ समय शाम 06 बजकर 20 मिनट से लेकर 08 बजकर 11 मिनट तक है. प्रात: 11 बजकर 30 मिनट से भी खरीदारी कर सकते हैं, राहुकाल के समय खरीदारी से बचें. इस दिन बर्तन और दूसरी अन्य चीजें खरीदने का समय शाम 7 बजकर 15 मिनट से रात 8 बजकर 15 मिनट तक बना हुआ है.

धनतेरस पूजा विधि

धनतेरस के दिन सुबह जल्द उठें और नित्यकर्म निपटाकर पूजा की तैयारी करें. घर के ईशान कोण में ही पूजा करें. मुंह ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए. पंचदेव यानी सूर्यदेव, श्रीगणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु की स्थापना करें. इसके बाद से करें-

धन्वंतरि देव की षोडशोपचार या 16 क्रियाओं से पूजा करें. पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नेवैद्य, आचमन, ताम्बुल, स्तवपाठ, तर्पण और नमस्कार. अंत में सांगता सिद्धि के लिए दक्षिणा भी चढ़ाएं.

धन्वं‍तरि देव के सामने धूप, दीप जलाकर मस्तक पर हल्दी, कुमकुम, चंदन और चावल लगाएं. फिर हार और फूल चढ़ाएं.

पूजा के दौरान अनामिका अंगुली से गंध यानी चंदन, कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी आदि लगाना चाहिए। षोडशोपचार की सभी सामग्री से पूजा कर मंत्र जाप करें.

पूजा के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) अर्पित करें. ध्यान रखें कि नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं होगा. हर पकवान पर एक तुलसी पत्ता भी रखें.

अंत में आरती करते हुए नैवेद्य चढ़ाकर पूजा पूरी करें. मुख्य द्वार या आंगन में प्रदोष काल में दीये जलाएं. एक दीया यम के नाम का जलाएं.

घर या मंदिर में जब भी विशेष पूजा करें तो इष्टदेव के साथ स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी किया जाता है.


पं.गणेशदत्त राजू तिवारी मल्हार जिलाध्यक्ष 
विश्व ब्राह्मण महापरिषद बिलासपुर छ.ग.।

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