कविता - 'ईश्क'
कवि - चुन्नू राम बंजारें
ईश्क जिसे कहते हैं, वह ईश्क नही होता
ऐसी दशा में हो जाये शादी तो आंख है रोता।
जोश में होश खो बैठा, एक दिवाना पागल
जब होश आया तो, हो गया था वह घायल।
आंसू बहाया दिन रात, रो राकर पछताया
अब क्या होता, कमान से निकली तीर वापस न आया।
ईश्क......
चुभ गई दिल में, कर गई लहुलुहान
लथपथ था खुन से, फिर भी बना वह महान।
यह बन गई, एक हकीकत कहानी
जो है एक युवक का जिन्दगानी।
हुआ ऐसा कि तीर चला ऐसा
दिल के आर-पार हो गया जैसा।
ईश्क......
मन ही मन रोया बहुत,
दिल को बहुत समझाया
दिवाना था पागल,
ईश्क ने उसे डुबाया।
लड़खड़ा गया जीवन में,
मुस्कील से सम्हल पाया
थरथरा-थरथरा कर चल रहा,
दिल ने उसे मनाया।
ईश्क.......
लेखक /कवि - 'साइंस वाणी' के संस्थापक, संपादक, प्रकाशक।
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