बचपन की यादें
'हमसफर मित्र न्यूज'।
मेरा बचपन याद मुझे बहुत आती है।
ये सफर अब ना मुझे वैसे भाती है।
वो रंग बिरंगे कंचे गिल्ली डंडे का खेल।
वो दोस्तों का बनाया हमारा मानव रेल।
वो गर्मी की ठंडक अमरैय्या।
वो घाँस की स्पंज सी शैय्या।
ना जाने कब तक चलती थी हमारी बाल पंचायत।
सब अपने आप को मानते थे न्यायप्रिय और महारत।
वो दादा नाना का दुलार,वो दादी नानी का लाड़ प्यार।
वो माता पिता की पुचकार,वो भाई बहन का दुलार।
वो मेरी मस्ती और पास पड़ोस की डांट फटकार।
आज भी याद आता है मुझे,वो भैय्या की मार।
शक्तिमान का दोपहर और मोगली की शाम।
गलती करें दोस्त,होता मैं ही बदमाश बदनाम।
संग में खाना,संग सोना,संग में रहना,संग में खेलना।
सच कहूँ तो बहुत याद आता है,दादा का उँगली पकड़ना।

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