'आज की कहानी'
☸️ "मां का वादा " ☸️
'हमसफर मित्र न्यूज'
अरी ओ रमिया कहा है तू, जल्दी इधर आकर मेरी एक बात तो सुन जरा"
आवाज लगाती हुई कांता ने रमिया की झुग्गी में कदम रखा तो देखा उसकी बेटी मीरा स्कूल की वर्दी पहने खड़ी थी...
कांता ने विस्मय से मीरा की ओर देखा और रमिया से बोली ये क्या इसे स्कूल भेज रही है तू???...
हां जिज्जी मैने कल सरकारी स्कूल में अपनी मीरा का दाखिला करा दिया है अब मेरी बच्ची भी पढ़ेगी, लिखेगी और खूब नाम कमाएगी, ये सब कहते कहते रमिया जैसे भविष्य ही देखने लगी थी...
अरे मूर्ख खुद के खाने पीने का तो पता नहीं है तुझे और चली है इसे पढ़ाने, कांता ने तीखा व्यंग किया तो रमिया बेबसी और अपमान से तिलमिला उठी... और बोली जिज्जी चार घरों में काम करके इतना तो कमा ही लेती हूं की अपना और अपनी बेटी का पेट भर सकू, रही बात पढ़ाई की तो सरकार ने 12वी तक की पढ़ाई लड़कियों के लिए निशुल्क कर दी है और ये बात मुझे मेरी एक मैडम ने जोकि सरकारी स्कूल में पढ़ाती है, ने कल बताया भी और दाखिला भी करा दिया है...
"पर तुझे क्या जरूरत पड़ गई इसे पढ़ाने की" मेरी बात मान और इसे मेरे साथ भेज दे, बच्चा खिलाने का काम है सुबह मेरे साथ जाकर शाम को मेरे साथ ही आ जाया करेगी...अच्छा खाना, कपड़े और पगार भी बढ़िया मिलेगी कांता बोली....
नही जिज्जी इसके पिता होते तो वो भी यही चाहते की उनकी बेटी पढ़े, लिखे...काल के क्रूर हाथों से मैं उन्हें तो बचा नही पाई पर अब ठान लिया है की ये मेरी तरह किसी की मोहताज नहीं रहेगी, मेरे मां बाप ने अगर मुझे पढ़ाया होता तो शायद मैं भी कही अच्छी नौकरी पर होती, यू घरों में बर्तन ना घिस रही होती और जो मैने सहा है, मेरी बेटी वो सब नही सहेगी ये एक मां का वादा है ... दृढ़ विश्वास से रमिया ने अपनी बेटी का हाथ पकड़ा और बाहर निकल आई..
पीछे से उसकी जेठानी कांता ने चिल्ला कर कहा...
हां ले जा, ले जा हम भी देखेंगे की चार किताब पढ़ने से इसे क्या मिल जायेगा ...
"सम्मान और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की ताकत " रमिया ने पलटकर जवाब दिया..
और चल पड़ी अपनी बेटी के साथ उसका जीवन संवारने।।।।
स्वरचित मौलिक रचना

No comments:
Post a Comment