'आज की कहानी'
चलो फुर्र से उड़ जाओ
'हमसफर मित्र न्यूज'
दोस्त के घर एक पंछी को पिंजरे में कैद देख पूछा, क्यों कैद कर रखा है, इसे उड़ने क्यों नहीं देते, उसने जवाब दिया, अरे इसे आज़ादी दी तो यह दूर गगन में जायेगा और तब बड़े पक्षी इसका शिकार कर लेंगे, मैंने तो इसकी हिफाज़त के लिए ही इसे कैद कर रखा है ।
कितनी बड़ी गलत फहमी है ना यह , प्रकृति ने इसे उड़ने के लिए पैदा किया है, इसे उड़ने दो, आगे इसकी नियति, पिंजरे में भी एक दिन तो मरना ही है।
फिर सोचा हम सब भी तो कैद करते हैं कभी खुद को, कभी अपने बच्चों को। कहीं जाएं, कुछ हो गया तो, कहीं पहाड़ पर गए, लैंड स्लाइड हो गया तो, बर्फ बारी हो गई तो, रोड एक्सीडेंट हो गया तो, रास्ते में किसी ने लूट लिया तो। यह सब भय के पिंजरे हैं।
बच्चों को बाहर मत जाने दो, बिगड़ गए तो।हमारे भय, हमारे घर, हमारे कंफर्ट जोन सब पिंजरे ही तो हैं।
क्या लगता है यह पिंजरे हमें सुरक्षा देते हैं,नहीं यह पिंजरे हमें कमजोर करते हैं, ये पिंजरे हमें पंख पसारने नहीं देते, ये पिंजरे हममें और हमारे बच्चों में आत्मविश्वास पैदा नहीं होने देते।
अभी दो साल पहले मुम्बई से लौटते समय कोटा उतरा, फिर कोटा से जयपुर की बस पकड़ी। एक महिला उसमें अपने बेटे को लेकर आईं। बेटे को किसी परीक्षा के लिए जयपुर जाना था। 12 वीं कक्षा में पढ़ता था। पहली बार अकेले कोटा से जयपुर जा रहा था तो मां घबराई थीं, बच्चा नर्वस। मां ने मुझसे अनुरोध किया, भाई साहब इसका ध्यान रख लेना, मैंने उन्हें आश्वस्त कर दिया। बच्चा बहुत मेधावी था, आंखों पर लगा मोटा चश्मा बता रहा था कि वो पूरी उम्र सिर्फ किताबों में खोया था, किताबों से बाहर भी कोई दुनिया होती है, पता नहीं था, माता पिता न खुद कहीं जाते थे ना बच्चे को कहीं जाने देते थे, वही एक बात पढ़ाई का नुकसान होगा।
मैंने सोचा हम पैदा हुए, स्कूल कॉलेज में अच्छे नंबर लाने की होड़ में लग गए, फिर बड़े नंबर्स के पैकेज की दौड़ में लग गए, फिर शादी की, बच्चे हुए और हमने उन्हें इन नम्बरों के पीछे दौड़ाने में लग गए। कब आज़ाद होंगे इन नम्बरों के पिंजरों से।
पता है आपको घूमने से बड़ी कोई शिक्षा नहीं, घुमक्कड़ी आपको अजनबियों से बात करने का आत्मविश्वास देती है, घुमक्कड़ी आपको अपने घर से सैकड़ों मील दूर भी जी सकने का विश्वास देती है।
घुमक्कड़ी आपको सिखाती है कि दुनिया बस आपकी टेबल पर रखे किसी नक्शे पर खींची गई लाइनें नहीं है, इसमें बर्फ के पहाड़ हैं , हरे घने जंगल भी हैं तो पानी की एक बूंद को तरसते रेतीले रेगिस्तान भी।
जिंदगी भी सदा फूलों की सेज नहीं होती ना, कभी खुशी कभी गम दोनों ही इसमें हैं तो घुमक्कड़ी आपको सिखाती है कि बर्फ से भरे रास्तों और तपते मरुस्थल में जीना कैसे है।
मेरा बस चले तो स्कूल कॉलेज में एक सब्जेक्ट घुमक्कड़ी भी अनिवार्य कर दूं। हफ्ता दस दिन निकल पड़ो कहीं भी और आकर बताओ कैसी लगी ये दुनिया, क्या जाना इससे क्या बताया इसे।
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मदन शास्त्री 'धरैल' नालागढ़ हिमाचल प्रदेश
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