'आज का सेहत'
कलाई पर बंधे मौली धागे में भी हैं सेहत का राज
प्रस्तुति - मनितोष सरकार
'हमसफर मित्र न्यूज'।
किसी भी धार्मिक कार्य में हाथ के कलाई पर मौली धागे बांधने का प्रावधान है। क्या आप जानते हैं इस मौली धागे में भी सेहत का राज छिपा हुआ है। नहीं जानते हैं तो पढ़िए आपका चहेती पोर्टल 'हमसफर मित्र न्यूज' के 'आज का सेहत' में...
कलाई पर लाल धागा, मौली, नाड़ा बांधने की पुरानी परंपरा है। इस लाल धागे को रक्षासूत्र भी कहा जाता है। इसके बिना पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। जब भी कलाई पर ये धागा बंधवाते हैं तो अपने मंत्रों का जाप भी किया जाता है। कलाई पर मौली बांधने से धर्म लाभ के साथ ही स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है। जानिए इस परंपरा से जुड़ी खास बातें...
मौली का शाब्दिक अर्थ है सबसे ऊपर, इसका अर्थ सिर से भी है। शंकर भगवान के सिर पर चंद्रमा विराजमान है, इसीलिए शिवजी को चंद्रमौलैश्वर भी कहा जाता है। मौली बांधने की प्रथा तब से चली आ रही है, जब दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए वामन भगवान ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था।
मौली बांधने से दूर होते हैं त्रिदोष-
* कलाई पर मौली वहां बांधी जाती है, जहां से आयुर्वेद के जानकार वैद्य नाड़ी की गति पढ़कर बीमारी का पता लगाते हैं।
* इस जगह पर मौली बांधने से पल्स पर दबाव बना रहता है और हम त्रिदोषों से बच सकते हैं।
* इस धागे से दबाव से त्रिदोष यानी कफ, वात और पित्त से संबंधित तीन तरह की बीमारियां कंट्रोल हो सकती है।
* कफ यानी सर्दी-जुकाम और बुखार से जुड़ी बीमारियां, वात यानी गैस, एसीडिटी से जुड़ी बीमारियां, पित्त यानी फोड़े-फूंसी, त्वचा से जुड़ी बीमारियां। इन सभी बीमारियों की परख वैद्य कलाई की नब्ज से करते हैं।



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